युवाओं सावधान : *बेरोज़गार युवाओं का मंच राष्ट्रविरोधी ताक़तों से दूर रहना चाहिए

युवाओं सावधान : *बेरोज़गार युवाओं का मंच राष्ट्रविरोधी ताक़तों से दूर रहना चाहिए.!*

*जो हितैषी बनकर सामने आए कहीं वह भर्ती घोटालों के धंधेबाज़ तो नहीं.!*

*2021–22 में टूटा नकल माफ़िया का साम्राज्य, हाकम सिंह समेत सौ के करीब गिरफ्तार*

उत्तराखंड का गठन विकास और युवाओं के भविष्य को सुरक्षित करने के सपनों के साथ हुआ था। लेकिन हकीकत यह है कि राज्य बनने से लेकर आज तक भर्ती परीक्षाएँ धांधली और नकल माफ़ियाओं के शिकंजे से कभी बाहर नहीं निकल पाईं। दरअसल, भर्ती घोटाला उत्तराखंड की राजनीतिक व्यवस्था का “डिफॉल्ट सिस्टम” बन चुका है।

*पुराने पन्नों से काला इतिहास*

एन.डी. तिवारी जैसे मुख्यमंत्री तक इस दलदल से नहीं बच पाए। दरोगा भर्ती कांड इसका जीता-जागता उदाहरण है, जब लिखित परीक्षा में अच्छे अंक लाने वालों को इंटरव्यू में जानबूझकर फेल कर दिया गया। कई युवा कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटते-काटते बूढ़े हो गए। हाकम सिंह जैसे चेहरे उसी दौर से थानों और चौकियों में जमे रहे और धांधली की गारंटी बने।

*पटवारी भर्ती* तो और भी शर्मनाक रही। आवेदन तक न भरने वालों को सीधे नियुक्ति पत्र थमा दिए गए। यह सिर्फ पेपर लीक या नकल नहीं थी, बल्कि युवाओं की नौकरियों का सीधा अपहरण था।

*जल निगम और तकनीकी संस्थानों का खेल*

*2005 और 2007 में पेयजल निगम* की परीक्षाएँ पंजाब यूनिवर्सिटी से कराई गईं। नतीजे हैरान करने वाले थे—बिहार के एक ही कॉलेज के छात्र करिश्माई ढंग से पास हो गए। आरक्षित पदों पर बाहरी राज्यों को नौकरियाँ दे दी गईं। और तो और, पहले से नौकरी कर रहे इंजीनियरों ने दोबारा परीक्षा दी, लेकिन वे फेल हो गए जबकि पहले फेल होने वाले इस बार पास हो गए। ये किस्सा आज भी जल निगम की गलियों में कानाफूसी बन कर जिंदा है।

*आयोग भी न बच पाया*

लोक सेवा आयोग और अन्य निगमों की भर्तियाँ भी विवादों में डूबी रहीं। ऊर्जा निगमों में तो अजीबोगरीब संस्थानों से डिग्रियाँ लेकर आए लोगों को नौकरी मिली। लेकिन किसी सरकार ने कार्रवाई करने की ज़रूरत नहीं समझी। न कोई हाकम पकड़ा गया, न कोई क़ानून बना।

2015 में लगा कि अब बदलाव होगा। उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UKSSSC) का गठन हुआ और पाक-साफ छवि वाले आईएफएस अधिकारी आरबीएस रावत को ज़िम्मेदारी मिली। लेकिन जल्द ही यह संस्था भी भ्रष्टाचार की फैक्ट्री बन गई। हाकम राज का दौर यहीं से शुरू हुआ। सहायक लेखाकार से लेकर ग्राम विकास अधिकारी तक, हर भर्ती में खेल हुआ।

*जब काली परछाईं टूटी*

2021–22 में पहली बार इस गैंग पर सख़्ती हुई। हाकम सिंह समेत सौ के करीब लोग सलाखों के पीछे पहुँचे। आयोग अध्यक्ष से लेकर बड़े अफ़सर जेल गए। नकल विरोधी क़ानून बना और इसके बाद हुई परीक्षाओं से युवाओं का भरोसा लौटने लगा। गरीब परिवारों के बच्चे मेहनत से नौकरी पाने लगे। लेकिन यह विश्वास स्थायी न रहा। हाकम का एक और चेहरा सामने आया और सिस्टम की सड़ांध फिर खुल गई। आज हालात यह हैं कि बेरोज़गार फिर से सड़क पर हैं और सीबीआई जाँच की माँग कर रहे हैं।

*बेरोज़गारों के लिए सबक*

इतिहास यही कहता है कि जो भी “हितैषी” बनकर सामने आते हैं, वे खुद इस धंधे का हिस्सा रहे हैं। इसलिए युवाओं को सावधान रहना होगा। परेड ग्राउंड का मंच किसी के राजनीतिक एजेंडे का अखाड़ा न बने। यहाँ बात सिर्फ नकल और धांधली के खिलाफ होनी चाहिए, न कि धर्म, जाति या राष्ट्रविरोधी नारेबाज़ी की।

युवाओं ने पहले भी अपनी ताक़त से सरकारों को झुकाया है। आज ज़रूरत है कि वे अपने आंदोलन को भटकने न दें। अगर यह लड़ाई ईमानदारी से लड़ी गई तो परेड ग्राउंड से उठी आवाज़, आने वाली पीढ़ियों के लिए मील का पत्थर साबित होगी।